"दीप" सुनाये गीत

Saturday, May 21, 2011

उलझन

 




क्या यायावर हो रहा हूँ मैं ?
क्यों भटक रहा हूँ मैं ?
क्या कुछ खो दिया है मैंने ?
जो ढूंढ रहा हूँ मैं ?

हाँ ! यायावर हो गया हूँ मैं,
कुछ भी तो नही खोया है मैंने,
हाँ,जो नहीं खोया और जो नहीं मिला,
वही ढूंढ रहा हूँ मैं |

क्यों चल रहा हूँ अज्ञात-पथ पर ?
क्यों सुन रहा हूँ मैं अनन्त की पुकार ?
कहाँ है वह अमृत-द्वार जिस की ओर बढ़ रहा हूँ मैं ?
क्या प्रयास असंभव-क्रांति का कर रहा हूँ मैं ?

हाँ ! अज्ञात-पथ पर चल रहा हूँ मैं,
पुकार अनन्त की सुन रहा हूँ मैं,
नहीं मिला है मुझे अमृत-द्वार,पर अमृत की दिशा में  ही तो बढ़ रहा हूँ मैं,
प्रयास भी संभव क्रांति का ही तो कर रहा हूँ मैं,

देख रहा हूँ एक ज्योति-किरण,
परम-आत्मा का पुण्य-वरण,
क्या अंतर की खोज में,एक एक कदम चलने से डर रहा हूँ मैं ?
क्या तामसी-पथ में उलझ गया हूँ मैं ?

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