हर सुबह आती थी खिल-खिलाती हुई,
परिंदों के गीतों साथ,
पर ये सुबह चुप-चाप सी क्यूँ है ?
परिंदे बे-वाक् से क्यों हैं ?
दिन इतने मुख्तासिर से क्यों हैं ?
रातें इतनी दर-बदर सी क्यों हैं ?
मेरे पल-पल की खबर रखने वाले,
आज मुझ से बे-खबर से क्यों हैं ?
मेरे तकलीफ में होने की खबर पे परसों,
अपना काजल बहा देने वाले,
मैं तकलीफ में हूँ,ये जान कर भी,
तू आज बे-असर सा क्यों है ?
आज नहीं पुकारा सुबह से,
एक बार भी उसने तो क्या हुआ,
है दिल उसका भी कुछ परेशां,
तो हाल इधर भी बेचैन से क्यों हैं ?
जब तक नहीं पुकारेंगे खुद आकर,
हम भी उठेंगे नहीं,
पर यहाँ भी नहीं सुकूं आज तो,
बिस्तर भी आज खदेड़ता क्यों है ?
वो आते और सो जाते सीने से लग के,
तो तसल्ली तो होती,
पर आज बदन में मेरे ये तपन सी क्यों है ?
हो जाती चमन महफिलें
हमारी शिरकतों से कभी,
आज हमारे आने से
मायूस ये अंजुमन क्यों है ?
परिंदों के गीतों साथ,
पर ये सुबह चुप-चाप सी क्यूँ है ?
परिंदे बे-वाक् से क्यों हैं ?
दिन इतने मुख्तासिर से क्यों हैं ?
रातें इतनी दर-बदर सी क्यों हैं ?
मेरे पल-पल की खबर रखने वाले,
आज मुझ से बे-खबर से क्यों हैं ?
मेरे तकलीफ में होने की खबर पे परसों,
अपना काजल बहा देने वाले,
मैं तकलीफ में हूँ,ये जान कर भी,
तू आज बे-असर सा क्यों है ?
आज नहीं पुकारा सुबह से,
एक बार भी उसने तो क्या हुआ,
है दिल उसका भी कुछ परेशां,
तो हाल इधर भी बेचैन से क्यों हैं ?
जब तक नहीं पुकारेंगे खुद आकर,
हम भी उठेंगे नहीं,
पर यहाँ भी नहीं सुकूं आज तो,
बिस्तर भी आज खदेड़ता क्यों है ?
वो आते और सो जाते सीने से लग के,
तो तसल्ली तो होती,
पर आज बदन में मेरे ये तपन सी क्यों है ?
हो जाती चमन महफिलें
हमारी शिरकतों से कभी,
आज हमारे आने से
मायूस ये अंजुमन क्यों है ?
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