"दीप" सुनाये गीत

Wednesday, November 16, 2016

चाय की चुस्की

मैं हैरान हूँ ये देखकर कि देश में ये कैसा महोल बना दिया गया है कैसी नई समस्या जन्मा दी गयी है, की आँखो के आगे जो हो रहा है वो नहीं देखा जाता और जो दिखाया जाता है, लोग वो स्वप्न देख रहे। सवप्नों तक भी सरकारी अतिक्रमण हो है।ये किस नशे में है देश कैसी नींद सोया है? ज़मीन के गड्ढे देखे नहीं जाते और बात कर रहे नक्षत्रों की।कुरूप और भद्दे पैर नहीं देखे जा रहे नज़र है मयूर पंख पर, ये देश को मूँगेरी लाल के सपने दिखाए जा रहे हैं।मुझे याद है नयी सरकार के बनते ही एक प्रयास पहला प्रयास और सबसे पहला झुनझुना बजाया गया था कि युद्ध स्तर पर जिस का पूरा देश दीवाना हो गया था अगर याद हो LED bulbs का उपयोग" क्या हो गया उस का? याद भी है? भुला दिया गया दूसरी तरफ़ झुनझुना बजा कर। इस तरह के सपने हर बार नए दिखाए गए और एक के बाद एक झुनझुना बजा कर भुलवा दिए गए।ये केवल एक उदाहरणहै।

अब देश को चाहिए कि सपनों की दुनिया से बाहर आए और देखे की कितने सपने देखे थे और कितने वास्तविकता तक पहचे? ये झुनझुने बजते रहेंगे, देश का मन बहलता रहेगा,मूर्खों का ख़ून खौलता रहेगा जैसे चाय म उबाल लाते हैं ना? आग तेज़ धीमा तेज़ धीमा तेज़ धीमा.....बस यही काफ़ी है इसी में तो मज़ा है । चाय वाला और क्या करता है? देश शौक़ीन है ही चाय का।कुछ लोग जानते हैं कि चाय नशा है और सेहत के लिए ख़राब पर बहुत कम लोग हैं जो समझते भी हैं और बरतते भी।चाय वाला कहकर कोई प्रधानमंत्री (ओह सॉरी, प्रधान सेवक कहना चाहिए था) बना है तो ज़रूर कुछ तो बात होगी। ज्ञान लगाओ चाय बनाने की पूरी प्रक्रिया कैसी होती है। ठीक वैसी ही देश बनाया जा रहा और पूरा देश चुस्कियाँ ले रहा है। ज़हर प्याले से होठों तक पहुँच जाता है और किसी को कानो कान ख़बर ही नहीं होती। पर कुछ लोग हैं जो दूर बैठे देखते रहते कि एक पतीली (देश की जनता) जिस के नीचे आग जलायी हुई है, कभी आग तेज़ फिर मंदी..... सतत यही प्रक्रिया । सिर्फ़ आग बुझती नहीं है।बस चल रही दुकान । लोग बैठे रहते घंटो अपना टाइम ख़राब करते । और क्या ?

जब आप जागरूक होते है, सवाल जवाब करते है, अपने आस पास के बारे में हो रही घटनाओ को अच्छे से समझते है तो उस समय आप चेतन अवस्था में होते है, वही दिन भर में बहुत सी घटनाये, चीजे आपके आस पास होती है लेकिन देख कर भी आप उसे नज़रंदाज़ कर देते है लेकिन याद करके या सोच कर आप उन घटनाओ या चीजो को दुबारा अपने सामने ला सकते है। जैसे सड़क पर चलते हुए आप कितने लोगो और दुकानों को देखते है लेकिन उनपर ध्यान नहीं देते लेकिन आपको सोचने के लिए कहा जाये तो आप बता सकते है की कौन से दुकान कहा थी। यानि दिमाग पर जोर देकर जिन चीजो को याद किया जा सकता है वह आपका subconscious (अर्धचेतन) भाग है। हमारी बहुत से कडवी यादे, इच्छाएं, डर होते है जिनके बारे में हम सोचने से डरते है और उसे अपने मन में दबा लेते है। यही बाते हमारे मन के अचेतन (unconscious) भाग में चली जाते है जिनके बारे में हमे नहीं पता रहता।जैसे आपके बचपन की कई बाते जिन्हें आपको याद करने के लिए कहा जाये तो आप उसे याद नहीं कर पाते।
और हम सदियों से एक डर में, कड़वी यादों में, और इच्छाओं में और उन से उपजे डर में जीते आए हैं या फिर डर से बचने के लिए उन को नज़रंदाज करते आए हैं।बहुत बड़ा या फिर यूँ कहे कि ज़्यादा हिस्सा देश या तो अर्धचेतन अवस्था में है या फिर अचेतन। जिसे अंदर इस बात की छटपटाहट है कि सदियों से जो खेल हुआ है हमारे साथ लूट का उस भँवर से कब बाहर आए। मगर फिर एक बार ये देश भँवर से निकलने ke प्रयास में लुटेरों के ही बेड़े में चढ़ गया है। और आँखें मूँद लेने अर्धचेतन बने रहने के अलावा कोई उपाय भी शेष नहीं है।

देश की सेहत का भला हो रहा! अब देश इतना आदि हो गया की चाय (देशभक्ति) के नाम पर कुछ भी पिला दो।

सर्पसत्र 9/11

जनमेजय का नाग यज्ञ है बना राष्ट्र का भक्षक,
सब सर्प हवन में हुत हुए पर बचा हुआ है तक्षक,

Thursday, November 10, 2016

रंग

हर रंग जिया है जीवन में, फिर भी कुछ रीता रीता हूँ,
तुम चले गए जो मीत मेरे,क्षण एक एक युग सा जीता हूँ,
सौ सौ भरे हैं प्याले मय के, मैं रिन्द नहीं जो बहक जाऊँ,
पी ली मद जो तेरे यौवन की, अब ना सम्भले संभाल पाऊँ,
है हवा ये तेरे इश्क़ की, जादू -बला या सज़ा समझूँ,
तू क़ैद भी करे न मुझ को, मैं भी फ़रार न होता हूँ,
हर रंग जिया है जीवन में......

एक ख़्वाब

एक ख्वाब सुहाना बचपन का कल रात जो मैंने सोते देखा,
मुँदी आँखों से पूरा बचपन और उम्रों को कम होते देखा,

माँ की गोद में सर रख कर के गहरी नींद में सोया था,
कदमों की आहट सुन बाबा के साथ जाने को रोया था,
वो घर पुराना बाखर-पौड़ी,आँगन बाहर की बैठक,
खेल क्रिकेट का,गुल्ली-डंडा,चोर-पुलिस अौर चैटक-मैटक,
बादाम का हलवा घी की चूरी, स्कूल जाना था मजबूरी,
क़दमताल कर मापा करते,देहरी से तुलसी की दूरी,
वो धाम-चौकड़ी दिन भर की,फिर सौ शिकायतें जग भर की,
पापा के घर आते ही सबको खोल किताबें पढ़ते देखा,
एक ख़्वाब सुहाना......

शहर

शहर की भी आवाज़ होती है,
ना ये सोती है ना ये खोती है,
मैं जहाँ हूँ वहाँ पसरा है सन्नाटा,
पदचाप सुनायी देती है, साँस सुनायी देती है
बहता पानी, उड़ता तीतर
शहर बाहर है या है इस के भीतर,
और ही हैं आवाज़ें इस की
जो शहर से बाहर सुनायी देती हैं
और यहाँ आ कर खोती हैं
शहर की भी आवाज़ें होती हैं ।

हुकूमत की रोटी

रोटी एक पकाई हुकुम ने, आधी कच्ची पक्की,
अंधों की तो फ़ौज खा गयी, हमने आँच पे रक्खि,
नगरसेठ तो पहले ही खा गए, लगा बटर बंबैय्या,
मुफ़्त की 'जियो' बाँट मार गए, वो पप्पू के भैय्या,
रंग गुलाबी इक गाड़ी का, दो दो लग गए पहिया,
डाल के घूँघट बैठी गोरी, कहा ले जावे सैंया,
कच्ची को हम कच्ची बोले, बोले पकी को पक्की,
काला चोर तो ना पकड़े साहिब, चोर की चोटी रक्खि,
बाहर से बन बाबा बैठे, घी नक़ली कि असली,
स्विस खातों की ना बात करो, अब रहो हिलाते पसलि,
माल्या अदानी क्रिकेट के मोदी, खा कर भग गए लोन,
नाक के नीचे हो गया  व्यापम, साहिब फिर भी मौन,
सर्जिकल स्ट्राइक की बातें, नोटों की बना लो झंडी,
उरी,बंसल,साहिब की सीडी, नजीब की बातें ठंडी।
जवान किसान ऐसे मर रहे, ज्यों सूखे ताल में मच्छि,
दिल्ली फँस गयी "जंग" धुआँ में, हुकुम की नीयत सच्ची ?

Saturday, January 12, 2013

मेरे छंद

मुझ को कवि बनाया तुमने , पर कविता मेरी बन न सकी,
मेरे छंदों के हर  शब्द तुम ही हो, पर पंक्तियाँ तुम बन न सकी।

मेरी सांसों का राग तुम्ही से, पर राग ये मेरे तुम सुन न सकी,
चित्त गगन में थे चित्र तुम्हारे, चित्रों में रंग तुम भर न सकी।

दिवा स्वपनों में देखा तुमको, रात्रि स्वप्न में ढूँढा तुमको,
भीगी चिड़िया मेरे सपनों की, लाख जतन तुम उड़ ना सकी।