एक ख्वाब सुहाना बचपन का कल रात जो मैंने सोते देखा,
मुँदी आँखों से पूरा बचपन और उम्रों को कम होते देखा,
माँ की गोद में सर रख कर के गहरी नींद में सोया था,
कदमों की आहट सुन बाबा के साथ जाने को रोया था,
वो घर पुराना बाखर-पौड़ी,आँगन बाहर की बैठक,
खेल क्रिकेट का,गुल्ली-डंडा,चोर-पुलिस अौर चैटक-मैटक,
बादाम का हलवा घी की चूरी, स्कूल जाना था मजबूरी,
क़दमताल कर मापा करते,देहरी से तुलसी की दूरी,
वो धाम-चौकड़ी दिन भर की,फिर सौ शिकायतें जग भर की,
पापा के घर आते ही सबको खोल किताबें पढ़ते देखा,
एक ख़्वाब सुहाना......
मुँदी आँखों से पूरा बचपन और उम्रों को कम होते देखा,
माँ की गोद में सर रख कर के गहरी नींद में सोया था,
कदमों की आहट सुन बाबा के साथ जाने को रोया था,
वो घर पुराना बाखर-पौड़ी,आँगन बाहर की बैठक,
खेल क्रिकेट का,गुल्ली-डंडा,चोर-पुलिस अौर चैटक-मैटक,
बादाम का हलवा घी की चूरी, स्कूल जाना था मजबूरी,
क़दमताल कर मापा करते,देहरी से तुलसी की दूरी,
वो धाम-चौकड़ी दिन भर की,फिर सौ शिकायतें जग भर की,
पापा के घर आते ही सबको खोल किताबें पढ़ते देखा,
एक ख़्वाब सुहाना......
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