"दीप" सुनाये गीत

Thursday, November 10, 2016

हुकूमत की रोटी

रोटी एक पकाई हुकुम ने, आधी कच्ची पक्की,
अंधों की तो फ़ौज खा गयी, हमने आँच पे रक्खि,
नगरसेठ तो पहले ही खा गए, लगा बटर बंबैय्या,
मुफ़्त की 'जियो' बाँट मार गए, वो पप्पू के भैय्या,
रंग गुलाबी इक गाड़ी का, दो दो लग गए पहिया,
डाल के घूँघट बैठी गोरी, कहा ले जावे सैंया,
कच्ची को हम कच्ची बोले, बोले पकी को पक्की,
काला चोर तो ना पकड़े साहिब, चोर की चोटी रक्खि,
बाहर से बन बाबा बैठे, घी नक़ली कि असली,
स्विस खातों की ना बात करो, अब रहो हिलाते पसलि,
माल्या अदानी क्रिकेट के मोदी, खा कर भग गए लोन,
नाक के नीचे हो गया  व्यापम, साहिब फिर भी मौन,
सर्जिकल स्ट्राइक की बातें, नोटों की बना लो झंडी,
उरी,बंसल,साहिब की सीडी, नजीब की बातें ठंडी।
जवान किसान ऐसे मर रहे, ज्यों सूखे ताल में मच्छि,
दिल्ली फँस गयी "जंग" धुआँ में, हुकुम की नीयत सच्ची ?

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