"दीप" सुनाये गीत

Saturday, January 12, 2013

तेरे बिन

हर सुबह आती थी खिल-खिलाती हुई,
परिंदों के गीतों के साथ,
ये सुबह चुप-चाप सी ,
और परिंदे बे-बाक से क्यूं हैं ?

दिन इतने मुख्तासिर क्यूं हैं,
रातें दर-बदर सी क्यूं हैं।
मेरे पल-पल की खबर रखने वाले,
आज मुझ से बेखबर से क्यूं हैं ?

मेरे तकलीफ में हने की खबर से, परसों,
अपना काजल बहा देने वाले,
मैं तकलीफ मैं हूँ ये जान कर भी,
आज तू बे-असर सा क्यूं है ?

जो नहीं पुकारा सुबह से एक बार भी तो क्या,
है दिल उसका भी परेशां, तो इधर भी हाल बेचैन से क्यूं हैं ?
जब तक नहीं पुकारेंगे हम उठेंगे नहीं,
यहाँ भी नहीं सुकूं आज तो, बिस्तर भी खादेस्ता सा क्यूं है ?

वो आते और सो जाते सीने से लग के तो तसल्ली तो होती,
पर आज तो बदन में भी ये तपन सी क्यूं है ?
हो जाती चमन महफिलें हमारे जाने से कभी,
पर आज हमारे आने से मायूस अंजुमने क्यों हैं ?


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