"दीप" सुनाये गीत

Saturday, January 12, 2013

खुदा को देखा है मैंने सरे-बाज़ार

कौन परवाह करता है यहाँ फरिश्तों के फरमानों की,
किसे चाह है यहाँ, बुजुर्गों के अरमानों की,
जब अंजुमने जमती है यारों की,
किसे याद रहती है, जमीर और संस्कारों की।

जहा बंदा रहता हो कशमकश औ परेशानी मैं,
तो क्यूं गरज पड़ी है उसे आशियानों की,
क्या कीमत है यहाँ रूह ओ प्राणों की,
यहाँ तो इन्सां को भूख लगी है इंसानों की।

कैसे किसी पे यकीन करे कोई, जब
लूट लेती हों आबरू, दीवारे खुद के ही मकानों की,
खुदा को देखा है मैंने सरे-बाज़ार चहल-कदमी करते हुए,
फिर क्यूं फकीरों को जरुरत पड़ी कुरानो की पुराणों की।

जब कश्तियाँ चल लेती साथ ता-उम्र मौजों के,
तो क्यूं राह देखते मांझी, मुहाने की,
अरे ! कौन तालीम दे इन नादानों को,
तलवारें नंगी ही घूमा करती जो न बनाते मयानों को।
                                   :) 
हमें तो राह चलती दो आँखें ही पिला देती हैं,
फिर क्यूं आस करते हैं नबाब, साकी के पैमानों की। 

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